आज नवरात्रि का तीसरा दिन है, और इस दिन माँ दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व है। माँ के मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की स्वर्णिम घंटा जैसी आकृति है, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और करुणामयी है, लेकिन जब अधर्म और अन्याय का नाश करने की बात आती है तो वे प्रचंड और वीर रूप धारण कर लेती हैं। माँ के इस रूप में शेर की सवारी, दस भुजाएँ और हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए अद्भुत छवि देखने को मिलती है।

माता चंद्रघंटा हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में धैर्य और शांति का महत्व उतना ही है जितना कि साहस और न्याय के लिए संघर्ष करने का। उनके करुणामयी स्वरूप से हमें दया, प्रेम और सहानुभूति को अपनाने की प्रेरणा मिलती है, वहीं उनके वीर रूप से यह संदेश मिलता है कि अन्याय और अत्याचार के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए।

मैं मानता हूँ कि यदि हम माँ चंद्रघंटा के इन गुणों को अपने जीवन में उतार लें तो न केवल हमारा परिवार, बल्कि पूरा समाज एक बेहतर दिशा में आगे बढ़ सकता है। मीरा भायंदर जैसे विकसित होते शहर में माँ की कृपा से हर नागरिक में धैर्य, करुणा और साहस के गुण जागें, तो यहाँ का हर घर प्रेम और प्रगति का प्रतीक बन सकता है। जिस प्रकार माँ अपने भक्तों की रक्षा करती हैं, उसी प्रकार हम सबको भी अपने परिवार, समाज और देश की भलाई के लिए खड़े होने का संकल्प लेना चाहिए।

माँ चंद्रघंटा की कृपा हम सब पर बनी रहे और हम उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन और अपने शहर को और अधिक उज्ज्वल बना सकें, यही मेरी प्रार्थना है।

जय माँ चंद्रघंटा!