आज नवरात्रि की सप्तमी तिथि है, और इस दिन हम माता कालरात्रि की आराधना करते हैं। माता कालरात्रि का स्वरूप जितना गंभीर और भीषण है, उतना ही करुणामयी और रक्षक भी है। उनके गले में राक्षसों के मुंडों की माला है, उनका शरीर श्यामवर्ण है, बाल बिखरे हुए हैं, तीन नेत्र हैं जिनसे ब्रह्मांड प्रकाशित होता है। वे काले बादलों की भांति प्रतीत होती हैं, किंतु उनका हृदय सदा अपने भक्तों के कल्याण के लिए समर्पित रहता है।

माता कालरात्रि भय का नाश करने वाली देवी हैं। वह अपने भक्तों को कठिन परिस्थितियों में साहस देती हैं और हर प्रकार के संकट से रक्षा करती हैं। उनका रूप हमें यह सिखाता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, उसमें से प्रकाश और मार्गदर्शन निकाला जा सकता है। यही उनका सबसे बड़ा गुण है—साहस, निर्भीकता और रक्षण।

मीरा-भयंदर और पूरे भारत के लोग यदि माता कालरात्रि के इन गुणों को अपने जीवन में उतार लें तो हर क्षेत्र में प्रगति संभव है। जिस प्रकार माता कालरात्रि अपने भीषण स्वरूप के बावजूद अपने भक्तों की रक्षा करती हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए। हमें कठिनाइयों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उनका सामना कर अपने परिवार और समाज का भविष्य सुरक्षित करना चाहिए।

मैं मानता हूँ कि यदि भारत के लोग माता कालरात्रि के गुणों को अपनाएं तो हमारे देश का विकास और भी तीव्र गति से होगा। साहस और निडरता से हम अपने घर-परिवार की रक्षा कर सकते हैं, अपने समाज में एकता ला सकते हैं और देश को आगे बढ़ा सकते हैं। मीरा-भयंदर के नागरिक यदि माता कालरात्रि के इस रूप को आदर्श मानकर अपने जीवन में उतारें, तो निश्चित रूप से यहां की हर गली, हर मोहल्ला, हर परिवार प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ेगा।

नवरात्रि का यह पर्व हमें यही संदेश देता है कि शक्ति केवल पूजने के लिए नहीं है, बल्कि अपने जीवन में धारण करने के लिए है। माता कालरात्रि का आशीर्वाद हम सब पर बना रहे और हम सभी उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने परिवार, समाज और राष्ट्र को और भी मजबूत बना सकें—यही मेरी हार्दिक प्रार्थना है।